जंतर-मंतर

शब्द ‘जंतर-मंतर‘, “यंत्र-मंत्र” का अपभ्रंश रूप है। इसे प्राचीन भारत में वेधशाला कहा जाता था और इसे अंग्रेजी में ऑब्जरवेटरी (observatory) कहते हैं।

प्राचीन भारत के वैज्ञानिकों ने इन वेधशालाओं का निर्माण कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जगहों पर किया था जिसे खगोलीय महत्व का स्थान माना जाता है। भारत के अनेक प्राचीन पुरातात्विक स्मारकों और मंदिरों का खगोलीय महत्व है।

भास्कराचार्य ने अपने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ और ‘करण कौतूहल’ ग्रंथों में खगोल वेध के निमित्त अनेक विधान रखे हैं। वराहमिहिर की ‘पंच सिद्धांतिका’ में इन वेधशालाओं को बनाने के सूत्र संकेत हैं। इन सबसे पहले वेदों में ज्योतिषीय गणनाओं के बारे में मिलता है।

अरब और मिस्र में कई प्राचीन विशालकाय वेधशालाएं थीं, लेकिन इस्लाम के आगाज के बाद अरब जगत की भव्यता और उसकी समृद्धि को नष्ट कर दिया गया। लगभग 5,000 वर्ष पूर्व निर्मित मिस्र के पिरामिड भी तारों की स्थिति जानकर ही स्थापित किए गए थे। ये सभी पिरामिड ओरायन तारा समूह को इंगित करते हैं। दूसरी ओर मोसोपोटामिया (इराक और सीरिया) में कई प्राचीन इमारतें और मंदिर थे जिन्हें नष्ट कर दिया गया।

भारत में उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर, काशी का विश्‍वनाथ मंदिर, गुजरात का सोमनाथ मंदिर, दिल्ली का ध्रुव स्तंभ (कुतुबमीनार) आदि सभी प्राचीन वेधशालाएं ही थीं, लेकिन मुगल काल में मुगलों के अधीनस्थ क्षेत्रों में ज्यादातर वेधशालाएं नष्ट कर दी गईं।

कोणार्क (उड़ीसा) का सूर्य मंदिर वस्तुतः एक सूर्य वेधशाला है। सूर्य को खुली आंखों से देखना कठिन है इसलिए इसकी अंश गणना अति कठिन समझी जाती है। इसको हल करने के लिए खगोलवेत्ताओं की एक मंडली ने राज-सहयोग से कोणार्क का सूर्य मंदिर बनाया और उसमें सूर्य का वेध संधान किया।

बाद में जयपुर के तत्कालीन शासक जयसिंह ने इस विषय में विशेष रुचि ली। उन्होंने ज्योतिष और खगोल के कई ग्रंथ पढ़े और राज ज्योतिषी पं. जगन्नाथ के साथ मिलकर उन्होंने ऐसी वेधशालाओं का निर्माण कराया जिन्हें आज ‘जंतर-मंतर’ कहा जाता है। आओ जानते हैं राजा जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित 5 प्रमुख जंतर-मंतरों के बारे में…


दिल्ली का जंतर-मंतर : दिल्ली के तत्कालीन शासक मुहम्मदशाह से आज्ञा पत्र प्राप्त करके प्रथम वेधशाला दिल्ली में बनाई गई। इसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वि‍तीय ने सन् 1724 में करवाया था। यह इमारत मध्यकालीन भारत की वैज्ञानिक प्रगति की मिसाल है।

दिल्ली के कनॉट प्लेस में स्थित स्थापत्य कला का अद्वितीय नमूना ‘जंतर-मंतर’ दिल्ली के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यह जंतर-मंतर वास्तुकला का अद्वितीय उदाहरण है। जंतर-मंतर में लगे 13 खगोलीय यंत्र राजा सवाई जयसिंह ने स्वयं डिजाइन किए थे। जंतर-मंतर में लगे तमाम यंत्रों की मदद से ग्रहों की चाल का अध्ययन किया जाता था।

यह स्मारक भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है। दिल्ली का जंतर मंतर समरकंद, उज्बेकिस्तान के अनुसंधान से प्रेरित है। यहाँ हर साल पर्यटकों के अलावा दुनियाभर से बड़ी संख्या में वास्तुविद, इतिहासकार और वैज्ञानिक भी आते हैं। इसके निर्माण में 6 साल का समय लगा था।


उज्जैन का जंतर-मंतर (MP) : दिल्ली में बनाए गए जंतर-मंतर के बाद राजा जयसिंह ने सन् 1733 ई. में मध्यप्रदेश के उज्जैन में वेधशाला का निर्माण किया। कर्क रेखा उज्जैन से होकर ही गुजरती है। महाकाल की गणना का भी उससे संबंध है। प्राचीनकाल में दुनिया का समय निर्धारण उज्जैन से ही होता था।

उज्जैन शहर में दक्षिण की ओर शिप्रा के दाहिनी तरफ जयसिंहपुरा नामक स्थान में बना यह प्रेक्षागृह ‘जंतर-महल’ के नाम से जाना जाता है। यहां 5 यंत्र लगाए गए हैं- सम्राट यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र, दिगंश यंत्र, भित्ति यंत्र एवं शंकु यंत्र। इन यंत्रों की सन् 1925 में महाराजा माधवराव सिंधिया ने मरम्मत करवाई थी।


वाराणसी की वेधशाला (UP) : इसके पश्चात राजा जयसिंह ने मान मंदिर में वाराणसी की छोटी वेधशाला बनवाई जिसमें मात्र 6 प्रधान यंत्र बनाए गए। वाराणसी में दशाश्वमेध घाट के ठीक बगल में स्थित है मान मंदिर महल। यह महल वास्तव में एक वेधशाला है।
मान मंदिर के नाम से विख्यात इस महल का निर्माण राजस्थान के आमेर के राजा मानसिंह द्वारा सन् 1600 ईस्वी के आसपास कराया गया। इसके बाद जयपुर शहर के संस्थापक राजा सवाई जयसिंह द्वितीय (1699-1743) ने इस महल की छत पर वेधशाला का निर्माण कराया।

वाराणसी की वेधशाला के 6 यंत्र-

1. सम्राट यंत्र : इस यंत्र द्वारा ग्रह-नक्षत्रों की क्रांति विषुवांस, समय आदि का ज्ञान होता है।
2. लघु सम्राट यंत्र : इस यंत्र का निर्माण भी ग्रह-नक्षत्रों की क्रांति विषुवांस, समय आदि के ज्ञान के लिए किया गया था।
3. दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र : यस यंत्र से मध्याह्न के उन्नतांश मापे जाते हैं।
4. चक्र यंत्र : इस यंत्र से नक्षत्रादिकों की क्रांति स्पष्ट विषुवत काल आदि जाने जाते हैं।
5. दिगंश यंत्र : इस यंत्र से नक्षत्रादिकों दिगंश मालूम किए जाते हैं।
6. नाड़ी वलय दक्षिण और उत्तर गोल : इस यंत्र द्वारा सूर्य तथा अन्य ग्रह उत्तर या दक्षिण किस गोलार्ध में हैं, यह मालूम किया जाता था।


मथुरा की वेधशाला (UP) :यंत्र प्रकार‘ तथा ‘सम्राट सिद्धांत‘ जैसे ग्रंथों की रचना द्वारा राजा जयसिंह द्वितीय ने उनके राज ज्योतिषी पं. जगन्नाथ के साथ मिलकर देशभर में 5 वेधशालाओं का निर्माण किया था, उनमें से एक मथुरा की वेधशाला भी थी। मथुरा की वेधशाला सन् 1850 के आसपास ही नष्ट हो चुकी थी। माना जाता है कि कंस के किले के पास यह वेधशाला थी।


जयपुर की वेधशाला : दिल्ली की वेधशाला के निर्माण के 10 वर्ष बाद राजा जयसिंह ने राजस्थान के जयपुर में वेधशाला बनाने का कार्य सन् 1718 से लेकर 1738 तक संपन्न कराया। इसे देश की सबसे बड़ी वेधशाला कहा जा सकता है। इसमें यंत्र अपेक्षाकृत अधिक लगे हैं और गणक सुविधा के लिए कुछ बड़े आकार के भी बनाए गए हैं। यूनेस्को ने 1 अगस्त 2010 को इस जंतर-मंतर विश्व धरोहर सूची में शामिल किया।

विद्याधर भट्टाचार्य नामक ज्योतिष और शिल्पकार की मदद से ही दिल्ली और जयपुर की वेधशालाओं का शिल्प तय किया गया था।

275 साल से भी अधिक समय से प्राचीन खगोलीय यंत्रों और जटिल गणितीय संरचनाओं के माध्यम से ज्योतिषीय और खगोलीय घटनाओं का विश्लेषण और सटीक भविष्यवाणी करने के लिए दुनियाभर में मशहूर इस अप्रतिम वेधशाला को देखने देश-विदेश से पर्यटक आते हैं।


जयपुर के जन्तर मन्तर में स्थित प्रमुख यन्त्र हैं :

उन्नतांश यंत्र : जंतर मंतर के प्रवेश द्वार के ठीक बांये ओर एक गोलकार चबूतरे के दोनो ओर दो स्तंभों के बीच लटके धातु के विशाल गोले को उन्नतांश यंत्र के नाम से जाना जाता है। यह यंत्र आकाश में पिंड के उन्नतांश और कोणीय ऊंचाई मापने के काम आता था। दक्षिणोदक भित्ति यंत्र

दक्षिणोदत भित्तियंत्र : उन्नतांश यंत्र के पूर्व में उत्तर से दक्षिण दिशाओं के छोर पर फैली एक दीवारनुमा इमारत दक्षिणोदत भित्तियंत्र है। सामने के भाग में दीवार के मध्य से दोनो ओर सीढियां बनी हैं जो दीवार के ऊपरी भाग तक जाती हैं। जबकि दीवार का पृष्ठ भाग सपाट है। यह यंत्र मध्यान्न समय में सूर्य के उन्नतांश और उन के द्वारा सूर्य क्रांति व दिनमान आदि जानने के काम आता था।

दिशा यंत्र : यह एक सरल यंत्र है। जंतर मंतर परिसर में बीचों बीच एक बड़े वर्गाकार समतल धरातल पर लाल पत्थर से विशाल वृत बना है और केंद्र से चारों दिशाओं में एक समकोण क्रॉस बना है। यह दिशा यंत्र है जिससे सामान्य तौर पर दिशाओं का ज्ञान होता है।

सम्राट यन्त्र : जंतर मंतर में सबसे विशाल यंत्र सम्राट यंत्र है। अपनी भव्यता और विशालता के कारण ही इसे सम्राट यंत्र कहा गया। यंत्र की भव्यता का अंदाजा इसी से हो जाता है कि धरातल से इसके शीर्ष की ऊंचाई 90 फीट है। सम्राट यंत्र में शीर्ष पर एक छतरी भी बनी हुई है। यह यंत्र ग्रह नक्षत्रों की क्रांति, विषुवांश और समय ज्ञान के लिए स्थापित किया गया था।

षष्ठांश यंत्र : षष्ठांश यंत्र, सम्राट यंत्र का ही एक भाग है। यह वलयाकार यंत्र सम्राट यंत्र के आधार से पूर्व और पश्चिम दिशाओं में चन्द्रमा के आकार में स्थित है। यह यंत्र भी ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति और अंश का ज्ञान करने के लिए प्रयुक्त होता था।

जयप्रकाश यन्त्र जयप्रकाश यंत्र ’क’ और जयप्रकाश यंत्र ’ख’ : जय प्रकाश यंत्रों का आविष्कार स्वयं महाराजा जयसिंह ने किया। कटोरे के आकार के इन यंत्रों की बनावट बेजोड़ है। जंतर मंतर परिसर में ये यंत्र सम्राट यंत्र और दिशा यंत्र के बीच स्थित हैं। इनमें किनारे को क्षितिज मानकर आधे खगोल का खगोलीय परिदर्शन और प्रत्येक पदार्थ के ज्ञान के लिए किया गया था। साथ ही इन यंत्रों से सूर्य की किसी राशि में अवस्थिति का पता भी चलता है। ये दोनो यंत्र परस्पर पूरक हैं।

नाड़ीवलय यंत्र : यह यंत्र प्रवेशद्वार के दायें भाग में स्थित है। यह दो गोलाकार फलकों में बंटा हुआ है। इनके केंद्र बिंदु से चारों ओर दर्शाई विभिन्न रेखाओं से सूर्य की स्थिति और स्थानीय समय का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।

ध्रुवदर्शक पट्टिका : ध्रुवदर्शक पट्टिका ध्रुव तारे की स्थिति और दिशा ज्ञान करने के लिए प्रयुक्त होने वाला सरल यंत्र है। उत्तर दक्षिण दिशा की ओर दीवारनुमा यह पट्टिका दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमश: उठी हुई है। इसके दक्षिणी सिरे पर नेत्र लगाकर देखने पर उत्तरी सिरे पर घ्रुव तारे की स्थिति स्पष्ट होती है।

लघु सम्राट यंत्र : लघु सम्राट यंत्र घ्रुव दर्शक पट्टिका के पश्चिम में स्थित यंत्र है। इसे धूप घड़ी भी कहा जाता है। इस यंत्र से स्थानीय समय की सटीक गणना होती है। लाल पत्थर से निर्मित यह यंत्र सम्राट यंत्र का ही छोटा रूप है इसीलिये यह लघुसम्राट यंत्र के रूप में जाना जाता है।

राशिवलय यन्त्र राशि वलय यंत्र : इनकी संख्या 12 है जो 12 राशियों को इंगित करते हैं। प्रत्येक राशि और उनमें ग्रह-नक्षत्रों की अवस्थिति को दर्शाते इन बारह यंत्रों की खास विशेषता इन सबकी बनावट है। देखने में ये सभी यंत्र एक जैसे हैं लेकिन आकाश में राशियों की स्थिति को इंगित करते इन यंत्रों की बनावट भिन्न भिन्न है।

चक्र यंत्र : लोहे के दो विशाल चक्रों से बने इन यंत्रों से खगोलीय पिंडों के दिक्पात और तात्कालिक के भौगोलिक निर्देशकों का मापन किया जाता था। यह राशिवलय यंत्रों के उत्तर में स्थित है।

रामयंत्र : राम यंत्र में स्तंभों के वृत्त के बीच केंद्र तक डिग्रियों के फलक दर्शाए गए हैं। इन फलकों से भी महत्वपूर्ण खगोलीय गणनाएं की जाती थीं। रामयन्त्र जंतर मंतर की पश्चिमी दीवार के पास स्थित दो यंत्र हैं। इन यंत्रों के दो लघु रूप भी जंतर मंतर में इन्हीं यंत्रों के पास स्थित हैं।

दिगंश यंत्र : इस यंत्र के द्वारा पिंडों के दिगंश का ज्ञान किया जाता था। दिगंश यंत्र निकास द्वार के पास स्थित है। यह यंत्र वृताकार प्राचीर में छोटे वृत्तों के रूप में निर्मित है।


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1 Comment

  1. Yantra
    Mantra
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